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अफसरशाही और सीएमओ कल्चर के आगे रबड़ स्टैंप बन गये बिहार के मंत्री

फसर बड़ा या मंत्री? अगर आठवीं कक्षा के किसी छात्र से भी यह पूछा जाये तो वह झट से इस सवाल का जवाब दे देगा. उसे उसकी नागरिक शास्त्र की किताबों में यही बताया गया है कि किसी भी विभाग का प्रमुख मंत्री होता है और अधिकारी उसके निर्देश के हिसाब से राजकाज चलाते हैं. मगर इन दिनों में बिहार सरकार के कई मंत्रियों को यह लगने लगा है कि नागरिक शास्त्र की शुरुआती किताब में जो सबक पढ़ाया गया था वह झूठ था. वे कहने को तो सरकार में मंत्री हैं, मगर उनके अपने ही विभाग में सचिव तो सचिव एक चपरासी तक उनके आदेश को नहीं मानता. अफसर अपनी मनमर्जी करते हैं.

राज्य के समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी ने तो अपने ही विभाग में बढ़ चुके अफसरों की अफसरशाही के खिलाफ इस्तीफा देने की पेशकश कर दी है और लगातार बयान दे रहे हैं. एक और मंत्री रामप्रीत पासवान ने मदन सहनी का समर्थन कर दिया है और कहा है कि वे कहते हैं राज्य के अफसरों में इगो की समस्या है, वे मंत्रियों का फोन तक नहीं उठाते. यह व्यवस्था ठीक नहीं. जनता को हमें जवाब देना पड़ता है, अफसरों को नहीं, इसलिए विभाग को हमारे हिसाब से चलना चाहिए.

और यह राज्य में कोई नयी घटना नहीं है, इससे पहले भी एक मंत्री जनक राम फरवरी महीने में जब अपने विभाग में कार्यभार संभालने पहुंचे तो वहां विभाग के सचिव तो दूर एक अधिकारी या कर्मचारी तक नहीं था. ऐसे में उन्होंने अपने विभाग के चपरासी से ही अपना स्वागत करा लिया.

सरकार में कई मंत्रियों की हैसियत कठपुतलियों जैसी!यह सच्ची बात है कि मौजूदा सरकार में कई मंत्रियों की हैसियत कठपुतलियों जैसी हो गयी है. राज्य के सचिवालय के गलियारों में लगातार भटकते हुए हम पत्रकारों को इस बात का अहसास बार-बार होता है. किसी खबरों के सिलसिले में अक्सर मंत्रियों से बातचीत करना आसान होता है, वे सहज उपलब्ध होते हैं, जबकि उसी विभाग के अफसरों के इतने नखरे होते हैं, कई दफा उनके बयान के बगैर ही खबरों को प्रकाशित कर देना पड़ता है.

उदाहरण के तौर पर इन पंक्तियों के लेखक को जब पिछले दिनों एक रिपोर्ट के सिलसिले में स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय से बात करने की जरूरत पड़ी तो उनका वक्त सहज ही मिल गया और उन्होंने 40-45 मिनट तक हमारी बातें सुनी और अपना पक्ष रखा. वहीं जब कोरोना काल में कई खबरों के संबंध में आधिकारिक टिप्पणी हासिल करने के लिए स्वास्थ्य विभाग के सचिव प्रत्यय अमृत से संपर्क साधने की कोशिश की तो उन्होंने न मुझे वक्त दिया और न ही मेल और वाट्सएप से भेजे गये किसी सवाल का जवाब दिया.

अपने अटपटे बयानों के लिए बदनाम मंत्री मंगल पांडेय पत्रकारों से ही नहीं, बल्कि आमलोगों से भी फोन पर बात कर लेते हैं. मगर सचिव महोदय जो अब अतिरिक्त मुख्य सचिव बन गये हैं, कभी पत्रकारों के असहज सवालों के लिए उपलब्ध नहीं होते.बिहार के ज्यादातर विभागों के अफसरों का है यही हाल
और यह सिर्फ एक असफर की बात नहीं है. बिहार के ज्यादातर विभागों के अफसरों का यही हाल है. असहज सवालों को इग्नोर करना और जवाब न देना उनकी स्वाभाविक कार्यप्रणाली बन चुकी है. यब बात राज्य के पत्रकारों के बीच अक्सर कही जाती रही है. अब जब राज्य के मंत्री यह कहने लगे हैं कि अफसर उनकी भी नहीं सुनते. उनका फोन नहीं उठाते तो हम पत्रकारों को समझ में आया है कि राज्य में अफसरशाही किस कदर हावी है.

एक मंत्री ने एक सीनियर पत्रकार को ऑफ द रिकार्ड बताया कि वे अमूमन हफ्तों अपने विभाग के कार्यालय में बैठे रहते हैं. मगर विभाग के अधिकारी उनके पास कोई संचिका नहीं भेजते. मगर जब कभी वे हफ्ते-दो हफ्ते के लिए क्षेत्रभ्रमण को जाते हैं तो इस बीच विभाग के अधिकारी तमाम संचिकाओं को इस टिप्पणी के साथ पास कर लेते हैं कि मंत्री महोदय स्वीकृति के लिए उपलब्ध नहीं हैं.

ऐसे में मंत्री मदन सहनी का यह आरोप कहना लगता है कि ऐसा लगता है कि वे सिर्फ कार पर घूमने और सुविधा भोगने के लिए मंत्री बने हैं. हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि मंत्रियों की नाराजगी की वजह ट्रांसफर पोस्टिंग के खेल में अधिकार न पाने की वजह से है, जिस काम के एवज में हर साल जून महीने में अरबों का भ्रष्टाचार होता है. अभी सारी कमाई अफसरों की होती है, कई मंत्री भ्रष्टाचार की उस बहती गंगा में अपने हाथ नहीं धो पाते. इसके बावजूद मंत्रियों की बात सैद्धांतिक रूप से सही है. यह बात हर जगह खुलकर कही जा रही है कि इस सरकार में अफसरशाही अपने चरम पर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अधिकारियों को असीमित अधिकार दे रखे हैं. क्या यह संवैधानिक रूप से सही है?

मुख्यमंत्री का है लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्रियों की टीम बनाने का दायित्व
यह सच है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मंत्रियों की टीम बनाने का दायित्व मुख्यमंत्री का है और मंत्रियों की जिम्मेदारी भी मुख्यमंत्री के प्रति है. साथ ही मंत्रालयों से जुड़े विभिन्न फैसले भी कैबिनेट की बैठक में होते हैं, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री खुद करते हैं. मगर आरोप है कि इतने नियंत्रण के बाद भी सीएम को संतुष्टि नहीं होती. वे अधिकारियों के जरिये विभाग के हर फैसले पर नजर रखते हैं और उन्हें अपने हिसाब से लागू कराते हैं. जैसे दिल्ली की सरकार में पीएमओ मजबूत है, उसी तरह बिहार में सीएमओ का दबदबा है.

कहा जाता है कि अक्सर अलग-अलग विभागों की फाइल भी सीएमओ में तैयार होती है और विभाग के अफसरों को भेज दी जाती है. बाद में उस फाइल पर अफसर मंत्रियों से यह कह कर साइन करवाते हैं कि फाइल सीएम ऑफिस से आयी है. और वस्तुतः यही मुख्य वजह है सरकार के मंत्रियों के कठपुतली बन जाने की. ऐसा खास तौर पर नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के मंत्रियों के साथ अधिक हो रहा है. उनके ज्यादातर मंत्री अपने विभाग के फैसलों पर सिर्फ दस्तख्त करने के अधिकारी हैं.

सहयोगी पार्टी भाजपा के कई मंत्रियों ने जरूर कुछ अधिकार हासिल कर लिये हैं. दूसरी बात जो साफ-साफ नजर आ रही है कि चाहे मदन सहनी हो या रामप्रीत पासवान दलित और बहुजन समुदाय के मंत्रियों को अक्सर सरकार रबड़ स्टैंप बनाकर रखती है. मगर यह जो कुछ हो रहा है और इसके बहाने जिस तरह सत्ता के केंद्रीकरण, सीएमओ कल्चर और अफसरशाही को बढ़ावा मिल रहा है, वह लोकतंत्र के हिसाब से ठीक नहीं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

ब्लॉगर के बारे में

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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