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Exclusive: ‘सुपर कॉप’ से साधक, डीजीपी पद छोड़ने की कहानी, गुप्तेश्वर पांडे ने दिए सभी सवालों के जवाब

पटना. बिहार पुलिस के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय (Gupteshwar Pandey) अक्सर चर्चा में रहे हैं. अब इस बार वे चर्चा में अपने नए रूप की वजह से हैं. कभी सख्त पुलिस अधिकारी के रूप में स्थापित गुप्तेश्वर पांडे ने अचानक से राजनीति में आने का फैसला किया. नौकरी से इस्तीफा देकर नेता बन गए. अब वे कथावाचक की नई भूमिका में नजर आ रहे हैं. उन्होंने पीतांबर धारण कर लिया है. न्यूज 18 से खास बातचीत में उन्होंने ‘सुपर कॉप’ से साधक बनने, राजनीति में आने और डीजीपी पद छोड़ने की कहानी से जुड़े सभी सवालों के जवाब दिए.

सवाल- आखिर सुपरकॉप से साधक क्यों? इस बदलाव की वजह क्या है?
जवाब- जीवन में मैं जितना डिजर्व नहीं करता था उतना मुझे मिला. मेरा बैक्ग्राउंड देख लीजिए. सीधे साधे परिवार से आता हूं. गांव में पढ़ा, कभी अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ा. हम डीजीपी हुए, मौका मिला हमको. मतलब ये कि सब कुछ मिला. जीवन का अंतिम लक्ष्य है सेल्फ रियलाइजेशन. ये संस्कार मुझमें बचपन से रहा है. भगवान की कथा का गायन करता हूं. अपनी आत्मशुद्धि के लिए है.

सवाल- जब डीजीपी का पद छोड़ा और राजनीति पकड़ी. सेल्फ रियलाइजेशन का इसमें कितना रोल है?
जवाब- घुमाकर मत पूछिए. टू द प्वाइंट पूछिए. मैं पब्लिसिटी नहीं चाहता. मैंने क्या गुनाह किया. मैंने क्या किया. भगवान की कथा कही तो क्या गलत किया. ये अपना-अपना परसेप्शन है. ये निर्भर करता है व्यक्ति विशेष की सोच से. अपनी मेहनत से ईश्वर के अनुग्रह से मुकाम हासिल किया. मुझे अपनी औकात से मिल गया.

सवाल- आपके पीछे तो राम हैं आपको छुपने की जरूरत क्या?

जवाब-
मुझे बिहार के लोगों ने बहुत सम्मान दिया. मैं जीवन से संतुष्ट हूं. अपनी आत्म शुद्धि के लिए प्रवचन कर रहा हूं. मुझे जज करने का यत्न मत करिए. सभी से प्रार्थना करता हूं, मुझे सहानुभूति की जरूरत नहीं. मैं खुद को महान नहीं कह रहा हूं.

सवाल- पार्टी की शरण में गए तो लेकिन कभी सोचा इसके बारे में कि आप मे वो गुण है कि नहीं?
जवाब- मनुष्य रजोगुणी प्रधान है. किसी को पीएम सीएम की कुर्सी मिला और वो मना कर दे तो वो संत है. मेरे अंदर भी रजोगुण है. मैं प्रभावित भी था. मैंने 26 जिलों में सेवाएं दी थी. मैं सफल पुलिस पदाधिकारी रहा. मेरा आलोचक या शत्रु भी मेरे काम को लेकर कभी किसी ने सवाल नहीं उठाया. 33 साल में कई सरकारों में कई चुनौतियों को देख चुका हूं. फिर कहता हूं मैं कहीं भी फेल नहीं हुआ.

सवाल-राजनीति में प्रवेश कैसे हुआ?
जवाब- राजनीति में मेरे भईया मेरा प्रवेश ही नहीं हुआ. जब विधायक बनता, मंत्री बनता तब मेरे काम पर ये सवाल खड़ा किया जा सकता था. लेकिन फिर मैं कहूंगा कि मेरे में वो योग्यताएं नहीं थीं जो राजनीति में जरूरी होती हैं.

सवाल- पार्टी सिंबल लेते हुए कुछ तो मंशा रही होगी?
जवाब- मैं राजनीति में जाना चाहता था मैं इसे इनकार नहीं करता. जाना चाहता था तभी तो डीजीपी का पद छोड़ दिया. ना मुझे नफा है और ना ही नुकसान. मेरे भीतर रजो गुण था. मैं भी जाना चाहता था चुनाव में. 7 किलो का कलेजा चाहिए डीजीपी का पद छोड़ने के लिए. टिकट मिल जाना विधायक बनने की गारंटी नहीं है. लड़ना और जीतना पड़ता है.

सवाल- जो सेवा आप कर रहे थे, उसे बड़ा सेवा करने की आयाम होता अगर आप विधायक होते.
जवाब- मेरी सोच थी सेवा करने की. जनता के बीच एक संदेश देना था कि विधायक हो तो ऐसा. मगर मौका नहीं मिला. प्रवेश ही नहीं हुआ. आज से 45 साल पहले की मेरी डायरी में लिखा है कि अंतिम लक्ष्य आत्म ग्यान प्राप्त करना था. मेरा प्रारब्ध दोषी है. मैं भूल चुका हूं. मेरा ये कोई नया अवतार नहीं है. 12 साल की उम्र से मैं प्रवचन करता था.

सवाल- राजनीति क्या छोड़ दी आपने?
जवाब- अभी मेरे मन में कुछ है ही नहीं. मैंने भगवान की शरण में हूं. मैं भगवान की मुरली हूं. जैसै बजाएंगे वैसे बजूंगा.

सवाल- राजनीति में अभी नहीं की कभी नहीं?
जवाब- आप बताइए अभी 5 मिनट बाद की गारंटी कोई ले सकता है. मेरे अंदर राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है. मैं उस लायक नहीं हूं और ना बन सकूंगा. राजनीति करने वालों की योग्यता अलग होती है.

सवाल- अगली कथा कहां है?
जवाब- मेरी दो कथाएं वृंदावन में है. वेस्ट बंगाल में है. बुंदेलखंड में है और भी कई जगहों पर है.

सवाल- कोई भजन सुनाएंगे?
जवाब- प्रभु आप की कृपा से सब काम हो रहा है.

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