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Modi Cabinet Expansion: जेडीयू के कई बड़े नेताओं ने सिलवाया कुर्ता, बनवाई नई बंडी

पटना. जेडीयू (JDU) के कई बड़े नेताओं ने नये कपड़े सिलवा लिये हैं. नया कुर्ता, नई बंडी और नई सदरी. पता नहीं कब दिल्ली से फोन आ जाए. पता नहीं किसके नाम की लॉटरी निकल जाये. पता नहीं किस पर नीतीश कुमार (Nitish Kumar) मेहरबान हो जाएं. सबको उम्मीद है कि इस बार मामला फिट हो जाएगा और उन्हें मोदी की ड्रीम टीम में जगह मिल जाएगी. दो साल पहले 30 मई को जेडीयू के दो कद्दावर नेता मंत्री बनते बनते रह गये थे. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह (RCP Singh) और राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह मंत्री पद की शपथ लेने के लिए तैयार बैठे थे, लकिन अंतिम समय तक बात नहीं बनी.

जेडीयू संख्याबल के आधार पर दो मंत्री पद की मांग कर रहा था, वहीं बीजेपी ने साफ कह दिया कि एक ही बर्थ खाली है. भारी बहुमत आने के बाद बीजेपी ने तय किया था कि वो एनडीए के सहयोगी दलों को एक-एक मंत्री का पद देगी. जेडीयू ने साफ इनकार कर दिया और तब से अब तक कई नेता वेटिंग का टिकट कटा कर बैठे हैं. अब देखना दिलचस्प होगा कि किस नेता की किस्मत उनका साथ देती है और किसे मायूसी हाथ लगती है. खबर है कि जेडीयू कोटे से दो लोगों को मंत्री बनाया जा सकता है. जेडीयू के कई दिग्गज नेता दिल्ली पहुंच चुके हैं और अंतिम समय तक लॉबिंग और जोड़-तोड़ का खेल जारी है. शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से बाहर जाने के बाद सबसे बड़े और मजबूत सहयोगी के रूप में जेडीयू को देखा जा रहा है.

आरसीपी का नाम तय लेकिन छोड़नी पड़ेगी अध्यक्ष की कुर्सी

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और जेडीयू में नंबर दो की हैसियत रखने वाले आरसीपी सिंह को नीतीश का सबसे करीबी माना जाता है. उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे आरसीपी सिंह का नाम फाइनल माना जा रहा है. खबर है कि प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव वाले आरसीपी के नाम पर नीतीश कुमार ने मुहर लगा दी है. दिक्कत बस एक है कि नीतीश कुमार पार्टी में एक व्यक्ति, एक पद के फार्मूले को लागू करना चाहते हैं. इसी फार्मूले के तहत उन्होंने खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था.

2016 में शरद यादव के जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष पद से हटने के बाद से ही नीतीश कुमार सीएम और अध्यक्ष पद की कुर्सी संभाल रहे थे, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ी सफलता नहीं मिली और इसके बाद ही नीतीश कुमार ने एक व्यक्ति, एक पद के फार्मूले पर अमल करते हुए आरसीपी सिंह को अध्यक्ष बनाया था. अब नीतीश कुमार चाहते हैं कि आरसीपी सिंह केंद्र में जनता दल यूनाइटेड का प्रतिनिधित्व करें और पार्टी की कमान किसी दूसरे नेता को सौंप दें. आरसीपी सिंह इस बात के लिए अभी तक तैयार नहीं हैं और वो मंत्री बनने के साथ ही अध्यक्ष की कुर्सी पर भी अपना कब्जा बरकरार रखना चाहते हैं. अगर आरसीपी सिंह मंत्री नहीं बने तो उपेंद्र कुशवाहा को इनाम मिल सकता है.

लव-कुश समीकरण में कुशवाहा की लगेगी लॉटरी?

नतीश के विरोध की राजनीति करने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने सभी रंजिशें भुलाकर नीतीश कुमार का हाथ थामा था. उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी संसदीय दल का नेता बनाकर नीतीश कुमार ने भी साफ संकेत दे दिये थे कि आने वाल समय में इस बागी नेता को बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है. अगर केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिस्ट में जेडीयू कोटे से उपेंद्र कुशवाहा का नाम सामने आ जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है. अगर आरसीपी सिंह अध्यक्ष पद ना छोड़ने की अपनी जिद पर अड़े रहते हैं तो संभावित मंत्रियों की लिस्ट से उनका नाम कट सकता है और उपेंद्र कुशवाहा की लॉटरी लग सकती है. उपेंद्र कुशवाहा के दोनों हाथों में लड्डू है. उन्हें या तो केंद्रीय मंत्री का पद मिलेगा या फिर जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया जा सकता है. उपेंद्र कुशवाहा के मंत्री बनने में एक ही दिक्कत है कि वे सांसद नहीं हैं. कुशवाहा पिछली बार काराकाट और उजियारपुर दो जगह से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और दोनों ही जगह से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजना भी मुश्किल है. ऐसे में आरसीपी का पलड़ा भारी लग रहा है.ललन सिंह को मिल सकता है लोजपा तोड़ने का इनाम

‘ऑपरेशन बदला’ को अंजाम देकर लोक जनशक्ति पार्टी को दो फाड़ करने वाले राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का नाम सबकी जुबान पर है. चिराग पासवान के पांव के नीचे से जमीन सरकाने वाले ललन सिंह को उनके काम का इनाम मिलना तय माना जा रहा है. बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को मुंगेर में हराकर संसद पहुंचने वाले ललन सिंह को बिहार का कद्दावर नेता माना जाता है. 30 मई 2019 में भी नीतीश की लिस्ट में ललन सिंह का नाम था और वे नीतीश कुमार के बेहद करीबी नेताओं में से एक हैं. पार्टी फंडिंग से लेकर पार्टी को मजबूत करने में ललन सिंह लगातार सक्रिय रहे हैं. बिहार विधान परिषद का सदस्य रह चुके ललन सिंह के पास नीतीश की पिछली सरकार में जल संसाधन जैसा अहम मंत्रालय था और वो सरकार का पक्ष पूरी मजबूती से रखते थे. नीतीश के बेहद करीबी होने की वजह से ललन सिंह हमेशा विपक्ष के निशाने पर भी रहे.

जेडीयू में एक अनार, सौ बीमार

आरसीपी, ललन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा तक ही जेडीयू की लिस्ट खत्म नहीं होती. संतोश कुशवाहा, चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी, दिलेश्वर कामत और विजेंद्र यादव के नाम की भी चर्चा जोर शोर से चल रही है. दो बार से पूर्णिया लोकसभा सीट से संसद पहुंचने वाले संतोष कुशवाहा जेडीयू का युवा चेहरा हैं और नीतीश के करीबी माने जाते हैं. राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले संतोष कुशवाहा पहले बीजेपी में थे और बैसी से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, लेकिन बाद में उन्होंने जेडीयू का दामन थाम लिया. संतोष कुशवाहा काफी प्रखर वक्ता हैं और पार्टी के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते रहते हैं. संतोष कुशवाहा के साथ ही राज्यसभा से सांसद रामनाथ ठाकुर को भी मंत्री पद का इनाम मिल सकता है. कर्पुरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर के पास राजनीतिक अनुभव है और वे बिहार सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं. इनके अलावा जहानाबाद से पहली बार सासंद बने चंदेश्वर प्रसाद का नाम भी चर्चा में है. नीतीश कुमार से उनके बेहतर संबंध हैं और उन्हें पार्टी का वफादार सिपाही माना जाता है. जेडीयू में वही मंत्री होगा जिसे नीतीश चाहेंगे, लेकिन वो कौन होगा ये किसी को नहीं पता. मंत्री बनने वालों की लिस्ट में दिलेश्वर कामत का नाम भी हो सकता है जो पार्टी का दलित चेहरा हैं. वह सुपौल सीट से जीतकर पहली बार संसद पहुंचे हैं. अनुभवी नेताओं में विजेंद्र यादव भी रेस में हैं. लालू प्रसाद के धुर विरोधी नेताओं में उनका नाम लिया जाता है और पार्टी अनुभव के आधार पर उन्हें मौका दे सकती है.

पारस का नाम फाइनल कराने में भी जेडीयू की भूमिका

जेडीयू के बाहर मंत्री बनने वालों में बिहार से अगर कोई एक नाम फाइनल है तो वो नाम है पशुपति पारस का. खबर है कि नीतीश ने अपनी लिस्ट बनाने से पहले पशुपति पारस का नाम फाइनल करवाया. पशुपति पारस अपने भतीजे चिराग पासवान के रवैये से काफी नाराज चल रहे थे, लेकिन पार्टी तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उधर नीतीश कुमार को किसी भी कीमत पर चिराग का नाम मंत्रियों की लिस्ट में मंजूर नहीं था. बस इसी के साथ शुरू हुई ‘ऑपरेशन बदला’ की कहानी. इस काम में जेडीयू के कई वरिष्ठ नेता जुटे और पशुपति पारस के साथ ही लोजपा के सभी सांसदों से बात की गई. आखिरकार पारस मंत्री बनने की शर्त पर ये जोखिम उठाने को तैयार हुए और उनके नाम पर मुहर लग गई. पशुपति पारस से खुद गृहमंत्री अमित शाह ने बात की और पारस दिल्ली पहुंच चुके हैं.

(बिहार के सियासी गलियारे की कानाफूसी)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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