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बिहार: अब तक 0.14 प्रतिशत बच्चों को ही पड़ी आईसीयू की जरूरत, केवल 11 फीसदी ही हुए कोरोना संक्रमित  

 यूनिसेफ के एक आंकड़े के अनुसार कोरोना काल के बड़े संकट के बाद भी बिहार में कोरोना से मरने वालों की संख्या केवल 0.68 प्रतिशत ही रही है। अब तक राज्य में 6.95 लाख कोरोना के मामले आये हैं, लेकिन इनमें केवल 4746 लोगों की ही मौत हुई है। कोरोना के तीसरे चरण में इसका बच्चों पर घातक असर होने की आशंका जताई जा रही है, लेकिन बिहार में अभी तक बच्चों के संक्रमित होने का आंकड़ा कम ही रहा है। 5 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच 0 से 19 वर्ष तक की आयु के बच्चों में कोरोना संक्रमण दर केवल 11 फीसदी ही पाई गई है। इन संक्रमित बच्चों में से 38.6 प्रतिशत लड़कियां और 61.3 प्रतिशत लड़के थे।

अच्छी बात यह है कि बच्चों में संक्रमण अपेक्षाकृत काफी कम गंभीर स्तर का रहा और अब तक केवल 0.14 प्रतिशत बच्चों को ही कोविड की वजह से आईसीयू में भर्ती करने की ज़रूरत पड़ी है। महामारी के दौरान बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनकर उभरा है। अनुमान है कि कोरोना की तीसरी लहर अनुमान से काफी कम खतरनाक साबित हो सकती है और अगर इस दौरान वैक्सीनेशन की पर्याप्त कोशिश की गई तो इसके असर से बच्चों को काफी हद तक बचाया जा सकेगा।          

6 जिलों में विशेष अभियान
संक्रमण की दृष्टि से बिहार के छ: जिलों में यूनिसेफ़ विशेष अभियान चलाएगा। इस अभियान में मुजफ्फरपुर, मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, पूर्णिया और सुपौल को शामिल किया जायेगा। इन जिलों में वयस्कों को कोरोना नियमों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाकर और सफाई रखकर इसका बच्चों पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जायेगा। मॉडल सफल रहने पर इसका पूरे बिहार पर इस्तेमाल किया जायेगा।  

ग्रामीण इलाकों में बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए ग्राम पंचायतों की भूमिका के बेहतर इस्तेमाल की योजना पर भी विचार-विमर्श चल रहा है। ग्राम पंचायतें बच्चों के स्वास्थ्य की निगरानी करने में ज्यादा सटीक और ज्यादा सहज भूमिका निभा सकती हैं।

बच्चों को संक्रमण से बचाना एक चुनौती
यह जानकारी देते हुए यूनिसेफ बिहार की शीर्ष अधिकारी निपुण गुप्ता ने अमर उजाला को बताया कि विशेष तौर पर बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था होने के कारण यह उनके लिए एक विशेष चैलेन्ज वाला अनुभव था। इस दौरान बच्चों को संक्रमण से बचाना एक चुनौती था, लेकिन अब कोरोना का असर कुछ कम होता दिखाई पड़ रहा है, हम कह सकते हैं कि बच्चों को संक्रमण से बचाने में काफी अच्छा काम किया गया है।

उन्होंने कहा कि बच्चों में संक्रमण बड़े लोगों के कारण ट्रांसफर होने की संभावना बनती है। इसलिए अगर हम समय से ज्यादा से ज्यादा आबादी को वैक्सीन दे सकें तो बच्चों तक संक्रमण पहुंचने की संभावनाओं को काफी कम किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए केंद्र, राज्य सरकारों से मिलाकर यूनिसेफ़ काम आकर रहा है।   

बड़ों का व्यवहार महत्त्वपूर्ण

यूनिसेफ बिहार की प्रमुख नफीसा बिंते शफीक़ ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि अगर हमें कोविड महामारी की तीसरी लहर से बच्चों की रक्षा करनी है, तो बड़ों को जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार करने और कोरोना प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार को ग्राम पंचायतों की मदद से निगरानी में तेजी लाने और बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की जरूरत है।

आईसीएमआर द्वारा किए गए तीन सीरो सर्वे के अनुसार, पहले, दूसरे और तीसरे सर्वेक्षण के दौरान 18 वर्ष से कम उम्र के 5, 12 और 40 प्रतिशत बच्चे क्रमशः कोरोना संक्रमित पाए गए। ऐसे सभी बच्चों ने बाद में एंटी-बॉडी विकसित कर ली। परन्तु शेष 33 प्रतिशत बच्चों में ऐसी कोई एंटी-बॉडी नहीं है, क्योंकि वे ना तो संक्रमित हुए और ना ही उनका टीकाकरण हुआ है। ऐसे में इन बच्चों के गंभीर रूप से प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है।

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