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कमजोर’ नीतीश के हाथों में है बिहार की कमान, जानें क्या है बीजेपी का असली प्लान

बिहार में सरकार गठन हो चुका है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर सातवीं बार शपथ ले चुके हैं। लेकिन सबकी निगाहें इस बार बड़े भाई की भूमिका में आई बीजेपी की रणनीति पर है। भाजपा ने बिहार में जेडीयू से बड़ी पार्टी होने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश कुमार को सौंप दी है, वहीं उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बिहार में अपने दो डिप्टी सीएम बनाने में कामयाब रही है। नीतीश के साथ कुल 14 मंत्रियों ने शपथ ली है, जिसमें बीजेपी कोटे से सबसे अधिक 7 मंत्री बनाए गए हैं। माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल के माध्यम से भाजपा ने बिहार में अपने राजनीतिक भविष्य को मजबूत करने की दिशा में प्रयास किया है।

नई लीडरशिप के लिए नए चेहरे

नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री का पद संभालने वाले सुशील मोदी इस बार मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं हैं। पार्टी ने बिहार में कैबिनेट गठन में अपने परंपरागत नेताओं के स्थान पर ऐसे नेताओं को जगह दी है जिन्हें जमीन से जुड़े हुए नेता माने जाते हैं। लिहाजा सुशील मोदी की जगह वैश्य समुदाय से आने वाले तारकिशोर प्रसाद को अहमियत दी गई है। बता दें कि तारकिशोर ने लगातार चौथी बार चुनाव जीत दर्ज की है, मगर पहली बार मंत्री बने हैं। वहीं अमरेंद्र प्रताप सिंह साल 2000 में पहली बार विधायक बने हैं और पिछला चुनाव छोड़कर लगातार जीतते आ रहे हैं। जीवेश मिश्रा भी लगातार तीसरी बार चुनाव जीते हैं। इसी प्रकार रामसूरत राय की भी पार्टी के पुराने  नेताओं में गिनती होती है। जबकि, रेणु देवी पांचवी बार विधायक बनी हैं और उन्हें दूसरी बार कैबिनेट में स्थान दिया गया है। भाजपा के इस कदम को बिहार में बीजेपी की नई लीडरशिप खड़ी करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।

राज्य में नंबर वन पार्टी बनने पर जोर

सियासी पंडितों का मानना है कि भाजपा  लंबे वक्त से बिहार में अपने दम पर पार्टी को उठाना चाहती है। ऐसे में  स्थानीय नेताओं को इस बार तरजीह दी गई है, जिसे पार्टी को अपने दम पर ताकतवर करने के प्रयास की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। नतीजतन बीजेपी ने डिप्टी सीएम का पद वैश्य समुदाय से आने वाले तारकिशोर प्रसाद और दूसरी कुर्सी अतिपिछड़ा समाज से आने वाली रेणु देवी को दिया।

वोट बैंक बढ़ाने की जुगत

सामान्यतः बीजेपी को सवर्णों की पार्टी कहा जाता है। मगर इस छवि तो तोड़ने के लिए पार्टी हर सम्भव कदम उठा रही है। बीजेपी ने मंत्रिमंडल के जरिए अपने सवर्ण मूलवोट वोटबैंक का पूरा ख्याल रखने के साथ अतिपिछड़ा वोटरों को भी संदेश देने का प्रयास किया है। बीजेपी की निगाह नीतीश कुमार के अतिपिछड़ा और महिला वोटवैंक को अपने साथ लाने का प्लान है। लिहाजा बीजेपी ने अपने कोटे से 2 पिछड़े, तीन सवर्ण, एक अतिपिछड़ा और एक दलित को मंत्रिमंडल में स्थान दिया है। इतना ही नहीं बीजेपी की नजर एलजेपी के मूलवोट बैंक दुसाध समुदाय पर भी है, जिसके लिए रामप्रीत पासवान को कैबिनेट में शामिल किया है। वहीं महिला कोटे के तौर पर रेणु देवी को जगह दी गई है। इसी तरह तेजस्वी यादव के कोर वोटबैंक माने जाने वाले यादव समुदाय को भी मंत्रिमंडल के जरिए सियासी संदेश देने के लिए रामसूरत राय को कैबिनेट में जगह दी गई है।

क्षेत्रीय समीकरण का पूरा ख्याल

बीजेपी ने कैबिनटे के जरिए क्षेत्रीय समीकरण का भी पूरा ख्याल रखा है। बीजेपी ने अपने कोटे के मंत्रिमंडल में भोजपुर, तिरहुत, चंपारण, मिथिलांचल और सीमांचल से आने वाले नेताओं को प्रमुखता दी है। भोजपुर के आरा इलाके से आने वाले अमरेंद्र प्रताप सिंह तो तिरहुत से रामसूरत राय को शामिल किया गया है। मिथिलांचल से दो मंत्री बनाए गए हैं। इनमें दरभंगा से जीवेश मिश्रा आते हैं तो रामप्रीत पासवान मधुबनी से आते हैं। वहीं, कटिहार से आने वाले तारकिशोर को डिप्टी सीएम बनाया गया है।

बिहार में बीजेपी का सियासी कद

बिहार में बीजेपी विधायकों की संख्या जिस तरह से है, उसके अनुसार उसे अपना सियासी कद बढ़ाने का अच्छा खासा अवसर मिल गया है। पार्टी 15 साल तक छोटे भाई की भूमिका में रह चुकी है और अब आगे भविष्य में अपने दम पर सत्ता में आने की राह बना रही है। नीतीश मंत्रिमंडल में जिस प्रकार से सुशील मोदी को हटाकर बीजेपी ने दो नए चेहरों को डिप्टी सीएम बनाया है, उससे साफ झलकता है कि पार्टी अपनी एक नई लीडरशिप बिहार में खड़ा करना चाहती है। माना जा रहा है कि  बिहार के 2025 के चुनाव में बीजेपी अपनी राजनीतिक ताकत को इतना कर लेना चाहती है कि उसे नीतीश कुमार के चेहरे के सहारे चुनावी मैदान में न उतरना पड़े। बल्कि अपने बुते वह सत्ता हासिल करने में सफल हो।

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